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शक्कर द्वारा परिरक्षित किए जाने वाले खाद्य पदार्थो में मुरब्बा एक विशिष्ट स्थान रखता हैं | प्राचीन काल से ही घरों में मुरब्बा बनाया एवं उपयोग किया जाता रहा है | कुछ विद्वानों के मतानुसार मुरब्बा तैयार करने की विधि यूनानी चिकित्सा-पद्वति के अन्तर्गत अविष्कृत मानी गयी है | हालाँकि इस तथ्य को नकारा नहीं जा सकता है कि मुरब्बे का प्रयोग औषधि के रूप में भी किया जाता है | आज के वैज्ञानिक खोजों के आधार पर यह साबित भी हो चुका है कि फल विशेष में उपस्थित कुछ निश्चित सक्रिय तत्वों में औषधीय गुण पाया जाता है | ( उदारहण के लिए बेल मे मार्मेलोसिन, सेब मे क्लोरोजेनिक एसिड आदि ) और उस फल विशेष को शक्कर द्वारा परिरक्षित करके बे मौसम भी उस फल विशेष का लाभ ले सकते हैं | मुरब्बा को परिभाषित करते हुए हम कह सकते हैं कि "सम्पूर्ण फल को अथवा उनकों मनचाहे टुकड़ों में काट कर कुछ विशेष उपचारों के बाद कम मात्रा वाले शर्करा युक्त घोल (चाशनी) में डालकर धीरे-धीरे घोल में शर्करा की मात्रा को ६८ प्रतिशत तक पहुँचा कर परिरक्षित किए गए शर्करा युक्त उत्पाद को मुरब्बा कहते हैं" |
प्राचीन काल में मुरब्बा बनाने की कोई मानक विधि नहीं थी | अनेक स्थानों पर विभिन्न विधियों से मुरब्बा तैयार किया जाता था, एवं उनकी संग्रहण क्षमता बहुत कम हुआ करती थी | यही कारण था कि मुरब्बा उद्योग कुछ वर्षो तक सुव्यवस्थित नही हो सका | परन्तु फल पदार्थ आदेश (१९५५) के अन्तर्गत मानक मुरब्बा तैयार करने की विधि एवं आवश्यकताएँ निश्चित किए जाने के बाद से मुरब्बे को वायुरूद्व रूप से डिब्बों में बन्द करने की विधि कों भी प्रमाणित किया गया है, जिससे कि मुरब्बे में किण्वन एवं पोषक तत्वों की हानि न हो सके | भारत सरकार ने फल पदार्थ आदेश (१९५५) के अन्तर्गत मुरब्बा तैयार करने हेतु निम्न विशेषताओं का उल्लेख किया है:
- फलों का प्रकार एवं किस्म : उचित किस्म का कोई भी फल
- तैयार पदार्थ में निम्नतम फल अंश : ५५ प्रतिशत
- तैयार पदार्थ में निम्नतम कुल विलेय ठोस : ६८ प्रतिशत
- अनुज्ञात्मक परिरक्षक : सल्फर डाई आक्साइड- ४ पी.पी.एम
बेन्जोइक - २ पी.पी.एम.
सामान्य लक्षण :
- मुरब्बा एक या अनेक मिश्रित फलों या सब्जियों से तैयार किया जा सकता है |
- उपयोग किये जाने वाले फल या सब्जी ताजेए
स्वच्छए स्वस्थ और पूर्णरूपेण पके हुए होने चाहिए |
- इसमें शक्कर, डेक्सट्रोज, अपवृत शर्करा या तरल ग्लूकोज़, सुगन्धित पदार्थ, साइट्रिक अम्ल, अनुज्ञात्मक रगं व परिरक्षक के अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं मिलाना चाहिए |
- फल या फलों के टुकड़े अपने रूप में तथा शीरे के साथ बिना सिकुड़े हुए होने चाहिए |
- तैयार पदार्थ किसी भी प्रकार की आपत्तिजनक गंध, सड़न, फंफूद आदि से मुक्त होना चाहिए |
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मुरब्बे के रूप में फल कों परिरक्षित करने हेतु फल के अन्दर उपस्थित नमी ( अर्थात
जल) को बाहर कर उसके स्थान पर शक्कर का गाढ़ा घोल व्याप्त कर दिया जाता है | इसे ही
""शक्कर का व्यापन"" सिद्वान्त कहते है
मुरब्बा तैयार
करने की विधि:
अध्ययन की सुविधा हेतु मुरब्बा तैयार करने की विधि को कुछ आसान खण्डों में
विभाजित कर सकतें है |
- फलों का चुनाव : ऐसे फलों का चुनाव कीजिए जो उबालने पर अपना मौलिक रूप
स्थिर रखते हों एवं दाग-रहित, बिना चोट खाए, समान आकार व आकर्षक रंग लिए हों |
उदाहरण के लिए आँवला, सेब, आम, बेल, करौंधा, अदरक आदि |
- फलों कों तैयार करना : इस खण्ड में फलों को धोना, छिलके उतारना, बीज निकालना
( आवश्यकतानुसार ) इत्यादि क्रियाएं सम्मिलित हैं | जों फल विशेष पर निर्भर करती
है |
- फलों कों गोदना : मुरब्बा बनाने की विधि में यह अत्यन्त आवश्यक क्रिया है
एवं इसके लिए लकड़ी या स्टनेलेस स्टील या एल्युमिनियम धातु के बने नुकीले गोदने
वाले कांटे का प्रयोग करना चाहिए |
- फलों को संसाधित करना : इस क्रिया का मुख्य उद्देश्य होता है फलों में से
अत्यधिक कसैलापन या अवांछनीय स्वाद को अलग करना एवं फलों का प्राकृतिक रंग
स्थिर रखना | इसके लिए फल एवं सब्जियों को आवश्यकतानुसार नमक या चूने के पानी
में कुछ निश्चित समय के लिए डुबोकर रखते हैं |
- फलों को उबालना : फलों की प्रकृति एवं उनकी कठोरता के अनुसार उन्हें
निश्चित समय के लिए उबाला जाता है इस क्रिया से उनकी कोशिकाएँ मुलायम पड़ जाती
है एवं उनमें शक्कर शीघ्रता से व्याप्त हो जाता है |
- फलों में शक्कर व्याप्त करना : यह एक मुख्य क्रिया है इसके सम्पन्न होते ही
मुरब्बा तैयार हो जाता है | हालांकि इस क्रिया हेतु विभिन्न विधियाँ अपनायी जाती
हैं, परन्तु उनमें से एक मुख्य एवं सर्वोत्तम विधि का वर्णन आगे किया जा रहा है
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सूखी शक्कर मिलाकर तीन दिनों तक कम समय के लिए पकाना:
इस विधि मे फलों की मात्रा से डेढ़ गुनी शक्कर की आवश्यकता होती है | आगे की विधि
निम्नवत् है:- प्रथम दिन:
कुल शक्कर के बराबर दो भाग कीजिए | किसी चौड़े बर्तन में तैयार सम्पूर्ण फल एवं एक
भाग शक्कर को परत द परत (एक परत शक्कर-एक परत फल) जमा दीजिए बर्तन को ढक कर २४ घण्टें
के लिए रख दें |
दूसरे दिन: बर्तन में फलों के अन्दर
से रस निकालने के कारण शक्कर का घोल (चाशनी) तैयार हो जाता है | इस घोल में से फल
के टुकड़े निकाल लें | घोल में १ ग्राम साइट्रिक अम्ल डाल कर ५ मिनट उबाल लें | घोल
के ठण्डा होने पर शेष चीनी के दो भाग कर एक भाग तैयार घोल में मिला दें फल के टुकड़े
वापस घोल में डालकर बर्तन को २४ घण्टे हेतु रख दीजिए |
तीसरे दिन: दूसरे दिन की सारी क्रिया
पुन: अपनाएं एवं शेष शक्कर पूरा मिला दें | परन्तु साइट्रिक अम्ल वांछित खटास के
अनुसार ही मिलाना चाहिए अन्यथा नहीं |
चौथे दिन: चाशनी कों फल सहित २-४ मिनट
उबाल लीजिए | फलों कों चाशनी से बाहर निकाल लीजिए | चाशनी को किसी साफ कपड़े
अथवा स्टेनलेस स्टील की छन्नी से छान लीजिए | चाशनी की कुल विलेय ठोस की
प्रतिशत्ता रिफ्रेक्टोमीटर की सहायता से ज्ञात कर लीजिए ६८ प्रतिशत का होना
आवश्यक है |
पात्रों का भरना:
तैयार मुरब्बा को
साफ-सुथरे जार में भरकर ६८ प्रतिशत (कुल विलेय ठोस) वाली चाशनी को भर दीजिए
| टिन के डिब्बे, ग्लास के जार तथा बड़े टिन के कनस्तर आदि का प्रयोग पात्र
के रूप किया जाता है |
पात्रों का संग्रहण: पात्रों को शुष्क
एवं ठण्डे स्थान पर संग्रहित करना चाहिए |
आँवले का मुरब्बा
आवश्यक सामग्री: आँवला १ किलों, शक्कर १ किलो,
साइट्रिक अम्ल १0 ग्राम, संसाधन हेतु नमक २0 ग्राम, फिटकरी २0 ग्राम |
विधि:
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बड़े किस्म के साफ-सुथरे, दाग रहित आँवले लीजिए |
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आँवलों को धुलकर उनको अच्छी प्रकार गोद लीजिए |
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गोदने के तुरन्त बाद आँवले को २ प्रतिशत नमक के घोल
में डालकर २४ घण्टे के लिए पुन : रख दीजिए |
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दूसरे दिन फलों को नमक के घोल से बाहर निकाल कर
साफ-सादे पानी में डाल दीजिए |
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दूसरे दिन आँवले को साफ पानी से धो लीजिए |
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आँवले को गर्म पानी में तब तक उबालिए जब तक वे
मुलायम नहीं हों जाते है |
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अब वर्णित गर्म पानी से निथारे गये तैयार मुलायम
आँवले में शक्कर व्याप्त करने हेतु पूर्व में वर्णित मुरब्बा तैयार करने
की विधि को अपनायें |
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